मुजफ्फरपुर स्थित बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय (BRABU) में 8 सितंबर, 2026 को एक पार्क निर्माण निविदा (टेंडर) को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया। ठेकेदारों ने आरोप लगाया है कि उन्हें कोटेशन पेपर (निविदा दस्तावेज) नहीं दिए गए और पूरी निविदा प्रक्रिया में अनियमितता बरती गई।
छोटे व्यवसायियों, ठेकेदारों और उद्यमियों के लिए निविदाएं सरकारी या अर्ध-सरकारी परियोजनाओं में काम पाने का एक महत्वपूर्ण जरिया होती हैं। निविदा एक औपचारिक प्रक्रिया है जिसमें कोई संस्था (जैसे विश्वविद्यालय) किसी विशेष कार्य (जैसे पार्क बनाना) के लिए विभिन्न कंपनियों या ठेकेदारों से प्रस्ताव या बोलियां आमंत्रित करती है। जो ठेकेदार सबसे अच्छी शर्तों पर काम करने को तैयार होता है, उसे यह काम दिया जाता है। यह प्रक्रिया प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देती है और सार्वजनिक धन का कुशल उपयोग सुनिश्चित करती है।
BRABU में हुए इस हंगामे के दौरान, कई ठेकेदारों ने शिकायत की कि उन्हें निविदा प्रक्रिया में भाग लेने के लिए आवश्यक दस्तावेज, जिन्हें कोटेशन पेपर कहा जाता है, उपलब्ध नहीं कराए गए। कोटेशन पेपर में परियोजना का विवरण, शर्तें और काम की विशिष्टताएं शामिल होती हैं, जिनके आधार पर ठेकेदार अपनी बोली तैयार करते हैं। ठेकेदारों का कहना है कि इस तरह की मनमानी से प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती है और छोटे तथा नए ठेकेदारों को समान अवसर नहीं मिल पाते।
व्यापारिक समुदाय के लिए निविदा प्रक्रिया में पारदर्शिता (खुलापन और निष्पक्षता) अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब निविदाएं निष्पक्ष तरीके से आयोजित नहीं की जाती हैं, तो यह छोटे व्यवसायों के लिए बड़ा नुकसान होता है। उन्हें लगता है कि उन्हें उचित मौका नहीं मिल रहा है, जिससे उनका भरोसा कम होता है और वे ऐसी प्रक्रियाओं से दूर रहने लगते हैं। यह न केवल ठेकेदारों के लिए बल्कि विश्वविद्यालय जैसी संस्थाओं के लिए भी अच्छा नहीं है, क्योंकि इससे उन्हें सर्वोत्तम मूल्य और गुणवत्ता वाले काम से वंचित होना पड़ सकता है।
8 सितंबर को हुई इस घटना ने बिहार के व्यापार और शिक्षा क्षेत्रों में निविदा प्रक्रियाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की चल रही चुनौतियों को उजागर किया है। यह देखना होगा कि विश्वविद्यालय प्रशासन इन आरोपों पर क्या कार्रवाई करता है ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।
