बिहार-यूपी के उद्योगों के लिए आवंटित सब्सिडी वाले कोयले की कालाबाजारी का आरोप

ThisNews Desk
बिहार-यूपी के उद्योगों के लिए आवंटित सब्सिडी वाले कोयले की कालाबाजारी का आरोप
चित्र: ClickerHappy / Pexels

अक्टूबर 2026 में, बिहार और उत्तर प्रदेश के उद्योगों के लिए आवंटित सब्सिडी वाले कोयले की झारखंड के रामगढ़ स्थित कुजू कोयला मंडी में खुलेआम बिक्री के आरोप सामने आए हैं। यह कोयला, जो बिहार और उत्तर प्रदेश में औद्योगिक संचालन और रोजगार सृजन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से दिया जाता है, सरकार द्वारा लगभग 5,000 रुपये प्रति टन की रियायती दर पर उपलब्ध कराया जाता है, जिसमें विभिन्न खर्च शामिल हैं।

आरोपों के अनुसार, बिहार और उत्तर प्रदेश के फैक्ट्री मालिक इस सब्सिडी वाले कोयले का उपयोग अपने निर्धारित कारखानों में करने के बजाय इसे कुजू मंडी में लगभग 9,000 रुपये प्रति टन में बेच रहे हैं। इससे उन्हें कथित तौर पर लगभग 4,000 रुपये प्रति टन का मुनाफा हो रहा है। छोटे व्यवसायियों के लिए, सब्सिडी वाला कोयला वह कोयला है जो सरकार उद्योगों को कम दाम पर देती है ताकि उनकी लागत कम हो और वे बेहतर काम कर सकें। वैध डिलीवरी ऑर्डर (DO) धारकों द्वारा सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (CCL) की ई-नीलामी से प्राप्त कोयले की लागत लगभग 10,500 रुपये प्रति टन है, जो इस कथित कालाबाजारी से उत्पन्न बड़े मूल्य अंतर को उजागर करता है।

यह कोयला "बिहार माइनिंग" और "यूपी माइनिंग" जैसी राज्य-स्तरीय खनन योजनाओं के तहत आवंटित किया जाता है। इस मुद्दे को स्थानीय कोयला व्यापारियों ने उठाया है, जो मामले की उच्च-स्तरीय जांच की मांग कर रहे हैं। गौरतलब है कि एक पूर्व विधायक ने पहले भी विधानसभा में यह मुद्दा उठाया था, लेकिन उस समय कोई कार्रवाई नहीं हुई थी। जागरण और हेड टॉपिक्स की 4 और 6 अक्टूबर, 2026 की खबरों के अनुसार, यह कथित अवैध व्यापार अभी भी जारी है।

यह स्थिति बिहार के व्यवसायों, विशेषकर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs), व्यापारियों और श्रमिकों को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। एमएसएमई छोटे और मध्यम आकार के व्यवसाय होते हैं जो अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। सब्सिडी वाले कोयले के डायवर्जन का मतलब है कि बिहार के उद्योगों को उनके विकास और रोजगार सृजन के लिए महत्वपूर्ण संसाधन से वंचित किया जा रहा है, जिससे राज्य के औद्योगिक विकास के प्रयासों को धक्का लग रहा है। वैध छोटे कोयला व्यापारी और मजदूर सस्ते, अवैध रूप से प्राप्त कोयले से उत्पन्न अनुचित प्रतिस्पर्धा के कारण अपनी आजीविका के लिए चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

इस तरह की कालाबाजारी बिहार की एमएसएमई नीति 2026 के उद्देश्यों के विपरीत है, जिसका लक्ष्य अगले पांच वर्षों में एक करोड़ एमएसएमई पंजीकरण प्राप्त करना और एक करोड़ से अधिक नौकरियां पैदा करना है, जिससे बिहार पूर्वी भारत में एक प्रमुख औद्योगिक केंद्र बन सके। यह नीति उद्यमियों को पूंजीगत सब्सिडी और अन्य प्रोत्साहन प्रदान करती है, जो कोयले जैसे आवश्यक संसाधनों के डायवर्जन से कमजोर पड़ जाते हैं। इसके अलावा, ये कथित गतिविधियां कोयला मंत्रालय द्वारा पारदर्शी और बाजार-संचालित कोयला व्यापार को बढ़ावा देने के लिए अधिसूचित कोयला विनिमय नियम, 2026 के भी खिलाफ हैं।

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