बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) सबौर राज्य की महत्वपूर्ण जलीय फसल मखाना की मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठा रहा है। केंद्रीय क्षेत्र योजना के तहत, बीएयू सबौर माइक्रो-प्रोसेसिंग इकाइयां स्थापित करने जा रहा है, जिसका उद्देश्य मखाना के स्थानीय प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देना है। इस पहल के संबंध में नवीनतम जानकारी 30 सितंबर, 2026 तक उपलब्ध है।
इस योजना के अंतर्गत, बिहार कृषि विभाग ने बीएयू सबौर के तहत कार्यरत कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) का चयन किया है। इन केवीके को प्रमुख मखाना उत्पादक क्षेत्रों में सूक्ष्म-स्तरीय मखाना प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित करने का काम सौंपा गया है। इन इकाइयों का मुख्य लक्ष्य किसानों को प्राथमिक प्रसंस्करण, ग्रेडिंग और मूल्य संवर्धन के लिए आधुनिक सुविधाएं प्रदान करना है। इससे किसान अपनी कच्ची उपज बेचने के बजाय, उत्पादन स्थलों के करीब ही मखाना का प्रसंस्करण कर सकेंगे, जिससे उन्हें अपनी फसल का बेहतर मूल्य मिल पाएगा।
इस पहल में बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) सबौर, बिहार कृषि विभाग और बीएयू के अधिकार क्षेत्र में आने वाले 22 कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) प्रमुख रूप से शामिल हैं। बीएयू सबौर के कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह ने इन इकाइयों की कृषि मूल्य संवर्धन और ग्रामीण रोजगार में योगदान करने की क्षमता पर प्रकाश डाला है। उन्होंने बताया कि ये इकाइयां न केवल किसानों की आय बढ़ाएंगी बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा करेंगी।
इस प्रयास को हाल ही में 15 सितंबर, 2025 को बिहार में शुरू किए गए राष्ट्रीय मखाना बोर्ड और दरभंगा स्थित राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र (एनआरसीएम) का भी समर्थन प्राप्त है। एनआरसीएम अनुसंधान और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जबकि राष्ट्रीय मखाना बोर्ड मखाना उद्योग के समग्र विकास के लिए काम कर रहा है। इन इकाइयों की स्थापना से बिहार के मखाना किसानों को आत्मनिर्भर बनने और अपनी उपज से अधिक लाभ कमाने में मदद मिलेगी, जिससे राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
