बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने हाल ही में कहा है कि फरक्का जल संधि (Farakka Water Treaty) राज्य के औद्योगिक जल तक पहुँच को महत्वपूर्ण रूप से प्रतिबंधित करती है, जिससे बिहार का आर्थिक विकास बाधित हो रहा है। मुख्यमंत्री ने बताया कि संधि की वर्तमान शर्तों के तहत, बिहार को गंगा का पानी साल में केवल चार महीने, जुलाई से अक्टूबर तक ही मिलता है। ये महीने बरसात के मौसम के साथ मेल खाते हैं, जिससे सूखे की अवधि में औद्योगिक और कृषि ज़रूरतों के लिए आवंटित पानी काफी हद तक अनुपयोगी हो जाता है।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने विभिन्न मंचों पर इन चिंताओं को उठाया है। इनमें 3 नवंबर, 2026 को भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम और 30 अक्टूबर, 2026 को राज्य जल संसाधन विभाग द्वारा आयोजित 'गंगा जल संधि: बिहार की जल सुरक्षा' पर एक संगोष्ठी शामिल है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि बिहार जैसे गरीब राज्य को कृषि, पेयजल और उद्योग स्थापित करने के लिए पर्याप्त पानी की आवश्यकता है, और इस आवश्यकता से समझौता नहीं किया जा सकता।
फरक्का जल संधि, जिसे आधिकारिक तौर पर गंगा जल बँटवारा संधि के नाम से जाना जाता है, पर भारत और बांग्लादेश के बीच 12 दिसंबर, 1996 को 30 साल की अवधि के लिए हस्ताक्षर किए गए थे और यह दिसंबर 2026 में समाप्त होने वाली है। यह संधि उन छोटे व्यवसायों, ठेकेदारों और उद्यमियों के लिए महत्वपूर्ण है जो राज्य में उद्योग स्थापित करने या कृषि-आधारित व्यवसाय चलाने की योजना बना रहे हैं, क्योंकि पानी किसी भी औद्योगिक या कृषि गतिविधि के लिए एक मूलभूत संसाधन है। पानी की कमी से उत्पादन लागत बढ़ सकती है और नए निवेश हतोत्साहित हो सकते हैं, जिससे राज्य के समग्र आर्थिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
बिहार सक्रिय रूप से अपने हितों को प्राथमिकता देने की वकालत कर रहा है, ताकि संधि के नवीनीकरण या फिर से बातचीत के संबंध में किसी भी चर्चा में राज्य की ज़रूरतों को पूरा किया जा सके। राज्य का अनुमान है कि औद्योगीकरण, सिंचाई और पेयजल की बढ़ती माँगों को पूरा करने के लिए उसे 2050 तक अतिरिक्त 2,000 क्यूसेक पानी की आवश्यकता होगी।
