बिहार राज्य दुग्ध सहकारी संघ लिमिटेड (कॉमफेड) द्वारा आंगनवाड़ी केंद्रों के लिए ₹1,432.12 करोड़ के पोषक तत्व-संवर्धित भोजन (फोर्टिफाइड फूड) की आपूर्ति के लिए जारी निविदा (टेंडर) विवादों में घिर गई है। उद्योग जगत के पर्यवेक्षकों का आरोप है कि निविदा के नियमों में किए गए बदलावों ने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) को प्रभावी ढंग से बाहर कर दिया है।
यह निविदा मूल रूप से 28 जुलाई, 2026 को अधिसूचित की गई थी और इसमें तीन संशोधन किए गए हैं, जिनमें दो बार जमा करने की समय-सीमा बढ़ाना और पात्रता मानदंडों में महत्वपूर्ण बदलाव शामिल हैं। सबसे बड़ा बदलाव बयाना राशि (Earnest Money Deposit - EMD) में हुआ है, जिसे ₹10 लाख से बढ़ाकर ₹28.64 करोड़ कर दिया गया है, जो लगभग 286 गुना की वृद्धि है। बयाना राशि एक सुरक्षा जमा होती है जो बोलीदाता अपनी गंभीरता दिखाने के लिए जमा करते हैं। आलोचकों का कहना है कि स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं के लिए इतनी बड़ी राशि की व्यवस्था करना लगभग असंभव है।
इसके अतिरिक्त, बोलीदाताओं को अब ₹75 करोड़ की न्यूनतम कुल संपत्ति (Net Worth) और पिछले पांच वित्तीय वर्षों में एकीकृत बाल विकास सेवाएँ (ICDS) या सरकारी आपूर्तियों से विशेष रूप से ₹100 करोड़ का औसत वार्षिक कारोबार (Annual Turnover) प्रदर्शित करना होगा। कुल संपत्ति कंपनी की वित्तीय मजबूती का पैमाना होती है, जबकि वार्षिक कारोबार एक साल में कुल बिक्री दर्शाता है। तकनीकी मानदंड भी बढ़ा दिए गए हैं, जिसमें पोषक तत्व-संवर्धित भोजन के कम से कम 15,000 मीट्रिक टन के वार्षिक विनिर्माण और आपूर्ति का ट्रैक रिकॉर्ड अनिवार्य किया गया है। संयुक्त उद्यम (Joint Venture) के नियम भी प्रतिबंधात्मक हैं, जिसके तहत मुख्य भागीदार को सभी तकनीकी और विनिर्माण मानदंडों को स्वतंत्र रूप से पूरा करना होगा।
8 सितंबर, 2026 तक चार फर्मों ने बोलियाँ जमा की थीं, लेकिन अयोग्य ठहराए जाने के बाद केवल दो दावेदार ही दौड़ में बचे हैं, जो अब वित्तीय मूल्यांकन की ओर बढ़ रहे हैं। सिविल कोर्ट के अधिवक्ता संजीव सौरभ ने इन शर्तों को एकतरफा और मनमाना बताया है, उनका तर्क है कि ये केवल धनी फर्मों तक प्रतिस्पर्धा को सीमित करती हैं और संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समान अवसर के संबंध में चिंताएँ बढ़ाती हैं। कॉमफेड ने चयन प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही उच्च न्यायालय में एक कैविएट (न्यायालय से अनुरोध कि उन्हें सुने बिना कोई आदेश न दिया जाए) भी दायर कर दी है।
यह स्थिति बिहार के व्यवसायों, MSMEs, व्यापारियों, श्रमिकों और उद्यमियों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि संशोधित मानदंड बिहार खरीद वरीयता नीति, 2026 जैसी स्थानीय उद्यमों को बढ़ावा देने वाली नीतियों की भावना के विपरीत प्रतीत होते हैं। उच्च वित्तीय और तकनीकी सीमाएँ स्थानीय निर्माताओं और आपूर्तिकर्ताओं को एक महत्वपूर्ण सरकारी खरीद परियोजना में भाग लेने से प्रभावी ढंग से रोकती हैं, जिससे स्थानीय आर्थिक विकास और रोजगार सृजन में बाधा आ सकती है।
