कटिहार में 'स्कूल चोरी' का दावा निकला भ्रामक, प्रशासन ने निविदा रद्द होने की पुष्टि की

ThisNews Desk
कटिहार में 'स्कूल चोरी' का दावा निकला भ्रामक, प्रशासन ने निविदा रद्द होने की पुष्टि की
चित्र: Peter Holmboe / Pexels

बिहार के कटिहार जिले में हाल ही में एक अजीबोगरीब मामला सामने आया, जहाँ प्राणपुर प्रखंड के डिघापार गाँव के ग्रामीणों ने एक पूरे स्कूल भवन के "चोरी" हो जाने का दावा किया। सितंबर 2026 की शुरुआत में, ग्रामीण ढोल-नगाड़े बजाते हुए कटिहार के वरिष्ठ अधिकारियों के पास पहुँचे और आरोप लगाया कि 44.85 लाख रुपये की लागत से बनने वाला एक स्कूल भवन अपने स्थल से गायब है।

ग्रामीणों की शिकायत के अनुसार, इस स्कूल भवन के लिए वर्ष 2024 में निविदा संख्या 2024_BSEB_314680-1 के तहत एक निविदा प्रक्रिया (टेंडर प्रक्रिया) आयोजित की गई थी। निविदा प्रक्रिया वह तरीका है जिससे सरकार या कोई संस्था किसी परियोजना के लिए कंपनियों या ठेकेदारों से प्रस्ताव आमंत्रित करती है। ग्रामीणों ने यह भी दावा किया कि 25 मार्च, 2025 को परियोजना पूर्णता प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया था। उनके आरोपों में यह भी शामिल था कि निर्माण एजेंसी (वह कंपनी जो निर्माण कार्य करती है) को 44.85 लाख रुपये की पूरी राशि तीन किस्तों में मिल चुकी थी: 18 अप्रैल, 2024 को 15 लाख रुपये, 28 सितंबर, 2024 को 15 लाख रुपये और अंतिम 14.85 लाख रुपये 12 मार्च, 2025 को।

इस शिकायत के बाद, कटिहार के जिला मजिस्ट्रेट (DM) आशुतोष द्विवेदी ने अनुमंडल पदाधिकारी (SDM) सूरज कुमार और जिला शिक्षा पदाधिकारी (DEO) राहुल चंद्र चौधरी के साथ मिलकर एक जाँच शुरू की। आधिकारिक जाँच में एक अलग ही तस्वीर सामने आई। जिला मजिस्ट्रेट ने स्पष्ट किया कि ग्रामीणों द्वारा संदर्भित निविदा (टेंडर) पहले ही रद्द कर दी गई थी। प्रशासन ने निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में कोई अनियमितता नहीं पाई गई और भ्रामक जानकारी फैलाई गई थी। अधिकारियों ने बताया कि स्कूल के निर्माण के लिए कथित तौर पर 44.85 लाख रुपये निकाले जाने या दुरुपयोग किए जाने का कोई सबूत नहीं मिला।

भले ही इस विशिष्ट घटना को आधिकारिक तौर पर भ्रामक जानकारी का मामला माना गया हो, यह बिहार में सार्वजनिक परियोजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही से संबंधित व्यापक चिंताओं को उजागर करता है। इस तरह के आरोप, भले ही निराधार हों, सरकारी खरीद प्रक्रियाओं (सरकारी खरीद के तरीके) और परियोजना निष्पादन में जनता के विश्वास को कम कर सकते हैं। ऐतिहासिक रूप से, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अक्षमता को बिहार में आर्थिक विकास और प्रगति में महत्वपूर्ण बाधाएँ माना गया है। ऐसी धारणाएँ वैध व्यवसायों, जिनमें सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSMEs) और ठेकेदार शामिल हैं, को सरकारी निविदाओं में भाग लेने से रोक सकती हैं, जिससे स्थानीय रोजगार और निवेश प्रभावित होता है। बिहार में व्यवसायों, व्यापारियों, श्रमिकों और उद्यमियों के लिए अनुकूल माहौल बनाने हेतु सार्वजनिक धन का प्रभावी और पारदर्शी उपयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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