भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने बिहार और झारखंड राज्यों के लिए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। 28 सितंबर, 2026 के अपने आदेश में, सुप्रीम कोर्ट ने पांच defunct (बंद हो चुके) राज्य-स्वामित्व वाले निगमों के दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों और अन्य श्रमिकों को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने प्रत्येक संबंधित कर्मचारी को एकमुश्त ₹1 लाख का भुगतान करने का निर्देश दिया है। इसके अतिरिक्त, कर्मचारियों के भविष्य निधि (EPF) बकाया पर 12% प्रति वर्ष का साधारण ब्याज और वेतन, मजदूरी तथा अन्य मौद्रिक बकाया पर 6% प्रति वर्ष का साधारण ब्याज देने का भी आदेश दिया गया है। यह ब्याज उस तारीख से गिना जाएगा जब ये राशियाँ देय थीं, जब तक कि उनका वास्तविक भुगतान नहीं हो जाता।
सरल शब्दों में कहें तो, कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) एक अनिवार्य बचत योजना है जिसमें कर्मचारी और नियोक्ता दोनों हर महीने योगदान करते हैं, ताकि कर्मचारी के रिटायरमेंट या भविष्य की जरूरतों के लिए एक फंड बन सके। इस फैसले से उन हजारों श्रमिकों को दशकों बाद न्याय मिला है, जिन्हें बिहार पुनर्गठन अधिनियम, 2000 के तहत बिहार से झारखंड के अलग होने के बाद से अपने वैध वित्तीय अधिकारों से वंचित रखा गया था।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ द्वारा दिए गए इस फैसले में बिहार स्टेट कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन लिमिटेड, बिहार स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड, बिहार स्टेट इलेक्ट्रॉनिक डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड, बिहार स्टेट फॉरेस्ट डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड और बिहार स्टेट पंचायती राज फाइनेंशियल कॉर्पोरेशन लिमिटेड के कर्मचारियों को शामिल किया गया है।
कुल 2,274 सत्यापित कर्मचारियों में से, 2,074 व्यक्तियों को मूल बकाया राशि का भुगतान पहले ही किया जा चुका है। लगभग 200 मामले अभी भी लंबित हैं क्योंकि कुछ कर्मचारी या तो लापता हैं या उनके पास आवश्यक दस्तावेज नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने बिहार और झारखंड राज्यों को 28 सितंबर, 2026 के आदेश की तारीख से तीन महीने के भीतर गणना किए गए ब्याज और मूल राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया है। जिन कर्मचारियों का पता नहीं चल पाया है या जिनके दावे सत्यापित नहीं हुए हैं, उनके लिए या उनके कानूनी वारिसों के लिए अपने दावे स्थापित करने के लिए संबंधित नोडल अधिकारी से संपर्क करने के लिए 12 महीने का समय दिया गया है।
यह निर्णय बिहार के श्रमिकों और छोटे व्यवसायों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह न केवल दैनिक वेतनभोगी श्रमिकों को लंबे समय से प्रतीक्षित राहत प्रदान करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि राज्य-स्वामित्व वाले निगमों के बंद होने से कर्मचारियों के अधिकारों को नकारा नहीं जा सकता। व्यवसायों के लिए, यह फैसला वैधानिक बकाया जैसे EPF और वेतन का समय पर भुगतान करने के महत्व को रेखांकित करता है। लंबे समय तक देरी के मामलों में भारी ब्याज देनदारियों की संभावना को देखते हुए, यह निर्णय सभी नियोक्ताओं के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि वे अपने कर्मचारियों के वित्तीय अधिकारों का सम्मान करें। EPF बकाया पर 12% और वेतन बकाया पर 6% ब्याज दर का अंतर भविष्य में सार्वजनिक क्षेत्र के विलंबित भुगतानों से संबंधित मामलों के लिए एक मिसाल कायम कर सकता है।
