बिहार सरकार की महत्वाकांक्षी "बिहार जल सुरक्षा और सिंचाई आधुनिकीकरण परियोजना" (BWSIMP) वर्तमान में राज्य में प्रगति पर है। ₹4,415 करोड़ की यह व्यापक पहल सिंचाई सेवाओं को आधुनिक बनाने, जल संसाधनों के वैज्ञानिक प्रबंधन को बढ़ावा देने और राज्य को बाढ़ व कटाव के प्रति अधिक लचीला बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई है। कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने 8 सितंबर, 2026 को इस परियोजना के चल रहे कार्यान्वयन की पुष्टि की।
इस परियोजना को मई 2025 में बिहार राज्य कैबिनेट द्वारा अनुमोदित किया गया था और वित्तीय वर्ष 2025-26 में इसका कार्य शुरू हुआ। इसे सात वर्षों में पूरा करने का लक्ष्य है। यह योजना विश्व बैंक और बिहार सरकार के संयुक्त वित्तपोषण से संचालित है। विश्व बैंक कुल लागत का 70 प्रतिशत यानी ₹3,090.50 करोड़ का योगदान कर रहा है, जबकि राज्य सरकार शेष 30 प्रतिशत यानी ₹1,324.50 करोड़ प्रदान कर रही है। जल संसाधन विभाग नोडल विभाग के रूप में कृषि विभाग और ग्रामीण विकास विभाग के साथ मिलकर इसका क्रियान्वयन कर रहा है।
परियोजना के प्रमुख घटकों में मौजूदा सिंचाई प्रणालियों का उन्नयन और पुनर्वास, उनके संचालन और रखरखाव में सुधार, तथा जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा देना शामिल है। "जलवायु-अनुकूल कृषि" का अर्थ है ऐसी खेती के तरीके अपनाना जो बदलते मौसम (जैसे सूखा या बाढ़) के प्रभावों का सामना कर सकें। यह तटबंधों और नदी-किनारों को मजबूत करने जैसी "ब्लू-ग्रीन" अवसंरचना के माध्यम से बाढ़ और कटाव प्रबंधन को भी मजबूत करती है। इसके अतिरिक्त, परियोजना का उद्देश्य हाइड्रोलॉजी और कृषि सूचना सहायता केंद्र (FMISC) जैसी संस्थागत क्षमताओं को मजबूत करना और राज्य जल नीति के विकास तथा एक जल नियामक प्राधिकरण की स्थापना का समर्थन करना है। "जल नियामक प्राधिकरण" एक ऐसी संस्था होती है जो पानी के उपयोग और वितरण के नियमों को तय करती है और उन पर निगरानी रखती है।
जलवायु-अनुकूल कृषि गतिविधियों के लिए रोहतास, बक्सर, कैमूर, मधुबनी, गोपालगंज और सीवान जिलों के ग्यारह प्रखंडों (ब्लॉकों) की पहचान की गई है। यह परियोजना विशेष रूप से बाढ़, जल जमाव और सूखे जैसी जलवायु-संबंधी चुनौतियों से प्रभावित जिलों को सीधा लाभ पहुंचाएगी।
यह पहल बिहार की अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, विशेषकर इसके कृषि समुदायों, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs), व्यापारियों, श्रमिकों और उद्यमियों के लिए। "कृषि समुदाय" वे लोग हैं जिनकी आजीविका मुख्य रूप से खेती पर निर्भर करती है। "MSMEs" छोटे और मध्यम आकार के व्यवसाय होते हैं। सिंचाई तक निरंतर पहुंच सुनिश्चित करके और जलवायु जोखिमों से कृषि उत्पादन की रक्षा करके, यह परियोजना खेती की स्थिरता में सुधार लाने और किसानों की आय बढ़ाने का लक्ष्य रखती है। इससे कृषि से जुड़े व्यवसायों को भी फायदा होगा।
