बिहार के रक्सौल हवाईअड्डा परियोजना में महत्वपूर्ण प्रगति हो रही है, जिसका लक्ष्य लंबे समय से निष्क्रिय इस सुविधा को एक कार्यात्मक विमानन केंद्र में बदलना है। बिहार सरकार ने नियोजित पुनर्निर्माण और उन्नयन की देखरेख के लिए एक इंजीनियरिंग कंसल्टेंसी सेवा फर्म की नियुक्ति के लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस उन्नत हवाईअड्डे के जून 2028 तक पूरा होने का लक्ष्य रखा गया है।
परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण अपने अंतिम चरण में है। एयरबस ए320 और बोइंग 737 जैसे बड़े विमानों के संचालन का समर्थन करने के लिए लगभग 139 एकड़ अतिरिक्त भूमि की पहचान की गई है। राज्य सरकार ने इस भूमि अधिग्रहण के लिए लगभग ₹207.70 करोड़ (कुछ रिपोर्टों में ₹208 करोड़ या ₹209 करोड़ भी) जारी किए हैं। जून 2026 तक, 1 जून, 2026 को जारी अंतिम सार्वजनिक सूचना के बाद, अधिग्रहित भूमि को भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) को हस्तांतरित करने की प्रशासनिक तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी हैं।
रनवे को 2,360 मीटर तक बढ़ाने की योजना है, जिससे वाणिज्यिक जेट संचालन और भारतीय वायु सेना के विमानों द्वारा आपातकालीन लैंडिंग संभव हो सकेगी। नए लेआउट में एक आधुनिक टर्मिनल भवन, एक एयर ट्रैफिक कंट्रोल (एटीसी) टावर और एक हवाईअड्डा कॉलोनी की भी योजना शामिल है। अगस्त 2026 में, बिहार सरकार ने सुरक्षित विमान संचालन के लिए बाधाओं को दूर करने के प्रयासों को तेज किया, जिसके तहत चिन्हित भवनों और पेड़ों को हटाने के लिए कानूनी कार्यवाही शुरू की गई। नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) और एएआई से विमान अधिनियम, 2024 और विमान (बाधाओं का विध्वंस) नियम, 2025 के तहत कार्रवाई करने का अनुरोध किया गया है।
उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने पुष्टि की है कि टेंडर प्रक्रिया चल रही है, उन्होंने सीमावर्ती क्षेत्रों में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कनेक्टिविटी के लिए परियोजना के महत्व पर प्रकाश डाला। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पहले अधिकारियों को भूमि अधिग्रहण में तेजी लाने का निर्देश दिया था। नागरिक उड्डयन सचिव नीलेश रामचंद्र देवरे ने भी परियोजना की प्रगति पर अपडेट प्रदान किए हैं।
भारत-नेपाल सीमा के पास पूर्वी चंपारण जिले में स्थित रक्सौल हवाईअड्डा, नेपाल के बीरगंज के साथ सीमा पार आवाजाही के लिए एक रणनीतिक केंद्र माना जाता है। हालांकि मध्य-2026 तक रक्सौल हवाईअड्डे से कोई निर्धारित वाणिज्यिक उड़ानें संचालित नहीं होती हैं, लेकिन इसके पुनर्विकास से चंपारण क्षेत्र और उत्तरी बिहार में व्यापार, पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को महत्वपूर्ण बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। यह लॉजिस्टिकल लिंक (माल और लोगों की आवाजाही की सुविधा) में सुधार करेगा, बढ़ी हुई व्यावसायिक गतिविधि (खरीद-बिक्री) और आगंतुक प्रवाह का समर्थन करेगा, और पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, सीतामढ़ी और शिवहर जिलों के निवासियों के लिए हवाई यात्रा को अधिक सुलभ बनाएगा। इस परियोजना से विमानन, आतिथ्य, खुदरा और निर्माण क्षेत्रों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह के रोजगार के अवसर पैदा होने की भी उम्मीद है, और इसे नए सैटेलाइट टाउनशिप के लिए एक उत्प्रेरक के रूप में देखा जा रहा है।
