गंगा जल बँटवारा संधि 2026 में समाप्त, बिहार बाढ़, गाद और पानी की उपलब्धता पर अपनी चिंताओं को शामिल करने की कर रहा है वकालत

ThisNews Desk
गंगा जल बँटवारा संधि 2026 में समाप्त, बिहार बाढ़, गाद और पानी की उपलब्धता पर अपनी चिंताओं को शामिल करने की कर रहा है वकालत
चित्र: Rajesh S Balouria / Pexels

1996 की भारत-बांग्लादेश गंगा जल बँटवारा संधि 12 दिसंबर, 2026 को समाप्त होने वाली है। इस महत्वपूर्ण घटनाक्रम ने बिहार के भीतर इसके भविष्य को लेकर गहन चर्चाएँ और कार्रवाईयाँ शुरू कर दी हैं। बिहार सरकार सक्रिय रूप से यह सुनिश्चित करने की वकालत कर रही है कि किसी भी नए या नवीनीकृत समझौते में बाढ़, गाद जमाव और सूखे मौसम में पानी की उपलब्धता से संबंधित उसकी चिंताओं को संबोधित किया जाए।

यह संधि गंगा नदी के जल के बँटवारे को नियंत्रित करती है, और इसके समाप्त होने से बिहार के लिए कई आर्थिक और पर्यावरणीय निहितार्थ हैं। राज्य विशेष रूप से तीन प्रमुख मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है:

पहला, बाढ़ (Flooding)। गंगा और उसकी सहायक नदियाँ अक्सर बिहार में विनाशकारी बाढ़ लाती हैं, जिससे कृषि भूमि, बुनियादी ढाँचे और छोटे व्यवसायों को भारी नुकसान होता है। बाढ़ से किसानों की फसलें बर्बाद हो जाती हैं, ठेकेदारों द्वारा बनाए गए पुल और सड़कें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, और व्यापारियों के लिए व्यापार बाधित होता है। एक नई संधि में बाढ़ नियंत्रण और प्रबंधन के उपायों को शामिल करना बिहार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

दूसरा, गाद जमाव (Siltation)। गाद जमाव का अर्थ है नदी तल में मिट्टी और रेत का जमा होना। यह समस्या नदी की गहराई को कम करती है, जिससे जहाजों और नावों का आवागमन मुश्किल हो जाता है, जो व्यापार और परिवहन के लिए महत्वपूर्ण है। गाद जमाव से नदी का जल-धारण क्षमता भी कम हो जाती है, जिससे बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है और सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता प्रभावित होती है। यह सीधे तौर पर कृषि-व्यवसाय और नदी-आधारित परिवहन से जुड़े उद्यमियों को प्रभावित करता है।

तीसरा, सूखे मौसम में पानी की उपलब्धता (Dry-season water availability)। गंगा में सूखे मौसम के दौरान पानी का स्तर कम हो जाता है, जिससे कृषि, पीने के पानी और औद्योगिक उपयोग के लिए पानी की कमी हो जाती है। बिहार चाहता है कि नए समझौते में यह सुनिश्चित किया जाए कि सूखे मौसम में भी राज्य को पर्याप्त पानी मिले ताकि किसानों को सिंचाई के लिए और अन्य व्यवसायों को अपनी जरूरतों के लिए पानी की कमी का सामना न करना पड़े।

बिहार सरकार का मानना है कि इन चिंताओं को दूर करना राज्य के आर्थिक विकास और उसके निवासियों की आजीविका के लिए आवश्यक है। छोटे व्यवसायियों, ठेकेदारों, व्यापारियों और उद्यमियों के लिए, एक प्रभावी जल प्रबंधन नीति स्थिरता और विकास के अवसर प्रदान कर सकती है, जबकि इन मुद्दों की अनदेखी से गंभीर आर्थिक नुकसान हो सकता है। राज्य इन वार्ताओं में अपनी स्थिति को मजबूती से प्रस्तुत कर रहा है ताकि एक ऐसा समझौता हो जो सभी हितधारकों के लिए न्यायसंगत और टिकाऊ हो।

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