बिहार: NH-333 के चौड़ीकरण को लेकर वन और सड़क निर्माण विभाग के बीच समझौता ज्ञापन रद्द

ThisNews Desk
बिहार: NH-333 के चौड़ीकरण को लेकर वन और सड़क निर्माण विभाग के बीच समझौता ज्ञापन रद्द
चित्र: Brett Sayles / Pexels

बिहार में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। राज्य के वन विभाग और सड़क निर्माण विभाग (RCD) के बीच 26 सितंबर, 2026 को हस्ताक्षरित एक समझौता ज्ञापन (MoU) को हाल ही में वापस ले लिया गया है। यह समझौता ज्ञापन, जो एक लिखित सहमति है, राष्ट्रीय राजमार्ग 333 (NH-333) के 10.5 किलोमीटर लंबे खंड के चौड़ीकरण और सुदृढ़ीकरण से संबंधित था।

इस परियोजना का उद्देश्य मुंगेर जिले के गंगाटा जंगल से गुजरने वाले NH-333 के किलोमीटर 28.340 से किलोमीटर 38.840 तक के एकल-लेन मार्ग को दो-लेन कैरिजवे में बदलना था। इस कार्य के लिए भीमबांध वन्यजीव अभयारण्य से 2.1 हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन आवश्यक था। इस परियोजना की संशोधित लागत 51 करोड़ रुपये निर्धारित की गई थी।

समझौता ज्ञापन के तहत, वन विभाग को न केवल वन मंजूरी प्राप्त करने बल्कि सड़क परियोजना के निष्पादन की भी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इस पर चिंता व्यक्त की गई कि यह हितों के टकराव का मामला हो सकता है, क्योंकि वन संरक्षण के लिए जिम्मेदार विभाग को एक सड़क परियोजना को पूरा करने और उसके लिए वैधानिक अनुमतियाँ (जैसे वन और वन्यजीव मंजूरी) प्राप्त करने का दोहरा कार्य सौंपा गया था। बिहार के वन बल प्रमुख (HoFF) अरविंदर सिंह ने, जिन्होंने RCD के इंजीनियर-इन-चीफ उमा कांत रजक के साथ MoU पर हस्ताक्षर किए थे, बाद में इस समझौते को वापस लेने की घोषणा की।

यह घटनाक्रम बिहार के व्यवसायों, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs), व्यापारियों और उद्यमियों के लिए महत्वपूर्ण है। यह बुनियादी ढांचा विकास में आने वाली जटिलताओं और शासन संबंधी चुनौतियों को उजागर करता है, खासकर जब परियोजनाएं पर्यावरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों को प्रभावित करती हैं। हालांकि राजमार्ग परियोजना का उद्देश्य कनेक्टिविटी, सड़क सुरक्षा और यातायात प्रवाह में सुधार करना था, जिससे व्यापार और परिवहन को लाभ होता, लेकिन प्रारंभिक व्यवस्था ने संस्थागत जवाबदेही और नियामक तथा विकासात्मक भूमिकाओं के स्पष्ट विभाजन पर सवाल उठाए।

समझौता ज्ञापन की वापसी नियामक जिम्मेदारियों को स्पष्ट रखने पर फिर से जोर देती है, जो पारदर्शी और टिकाऊ बुनियादी ढांचा विकास के लिए महत्वपूर्ण है। पर्यावरण मंजूरी प्राप्त करने में देरी, जैसा कि इस परियोजना के लिए 'राज्य स्तर पर लंबित' स्थिति से पता चलता है (30 सितंबर, 2026 तक), परियोजना की समय-सीमा और लागत को प्रभावित कर सकती है। इससे व्यवसायों और श्रमिकों को बेहतर बुनियादी ढांचे से मिलने वाले आर्थिक लाभों पर भी अप्रत्यक्ष रूप से असर पड़ सकता है। बिहार की व्यापक रणनीति में 50 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाओं के लिए भू-स्थानिक विश्लेषण (भौगोलिक डेटा का उपयोग करके वैज्ञानिक योजना) को अनिवार्य करना शामिल है, जो अधिक कुशल परियोजना निष्पादन की दिशा में एक कदम है।

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