20 अगस्त, 2026 को बिहार के श्रम, नियोजन एवं कौशल विकास मंत्री अरुण शंकर प्रसाद को पटना के नियोजन भवन में विरोध प्रदर्शन का सामना करना पड़ा। यह विरोध राज्य सरकार के लगभग 1700 कौशल विकास केंद्रों को बंद करने के आदेश के जवाब में हुआ, जिसके दौरान मंत्री के खिलाफ "मंत्री चोर है" के नारे लगाए गए।
इन केंद्रों के संचालक और कर्मचारी मंत्री प्रसाद से मिलने की मांग को लेकर नियोजन भवन में एकत्र हुए थे। जब सुरक्षाकर्मियों ने मंत्री का गेट बंद कर दिया, तो उत्तेजित भीड़ ने मंत्री और विभागीय सचिव के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि सरकार के इस फैसले से 10,000 से अधिक लोगों ने अपनी नौकरी खो दी है। इस हंगामे के बीच, मंत्री प्रसाद को पिछले दरवाजे से सुरक्षित बाहर निकाला गया।
कौशल विकास केंद्र ऐसे संस्थान होते हैं जहाँ युवाओं को विभिन्न व्यावहारिक हुनर सिखाए जाते हैं, जैसे कंप्यूटर संचालन, सिलाई, वेल्डिंग या अन्य तकनीकी कार्य, ताकि वे रोजगार पा सकें या अपना छोटा व्यवसाय (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम – MSME) शुरू कर सकें। इन केंद्रों का बंद होना सीधे तौर पर उन छोटे व्यवसायों और उद्यमियों को प्रभावित करता है जो कुशल श्रमिकों पर निर्भर करते हैं।
अरुण शंकर प्रसाद बिहार कैबिनेट में श्रम, नियोजन एवं कौशल विकास विभाग का प्रभार संभालते हैं। यह घटना राज्य के व्यापक आर्थिक लक्ष्यों के साथ एक संभावित विरोधाभास को उजागर करती है। बिहार के 2026-27 के बजट और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के बयानों में औद्योगीकरण में तेजी लाने, रोजगार के अवसर बढ़ाने और कौशल विकास को प्रमुख प्राथमिकताओं के रूप में रेखांकित किया गया है, जिसमें अगले पांच वर्षों में 1 करोड़ नौकरी और रोजगार के अवसर पैदा करने का नया लक्ष्य शामिल है। कौशल विकास केंद्रों को बंद करने का वर्तमान निर्णय और उसके बाद के विरोध प्रदर्शन, नीतिगत घोषणाओं और जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन के बीच एक संभावित अंतर को दर्शाते हैं, जिससे राज्य में रोजगार सृजन और कौशल-आधारित उद्यमों के लिए समग्र व्यावसायिक माहौल प्रभावित हो रहा है।
